मैं पंडित पंकज शास्त्री हूँ और विभिन्न धार्मिक पूजा-पाठ और संस्कार पूरे विधि-विधान के साथ करवाता हूँ। यदि आप अपने घर, मंदिर या किसी पवित्र स्थान पर मुंडन संस्कार या अन्य पूजा करवाना चाहते हैं, तो आप सीधे मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
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मुंडन संस्कार
गृह प्रवेश पूजा
सत्यनारायण कथा
विवाह / शादी संस्कार
नामकरण संस्कार
हवन और यज्ञ
नवग्रह शांति पूजा
रुद्राभिषेक पूजा
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“चैत्रे मासि जगद्ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेहनि।
शुक्लपक्षे समग्रं तत तदा सूर्योदये सति।।“
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्य उदय के समय भगवान ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि सत्ययुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ था। इसी कारण से यह तिथि भारतीय परंपरा में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भारत के महान सम्राट विक्रमादित्य ने भी लगभग 2100 वर्ष पूर्व अपने विक्रम संवत्सर का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्य उदय के समय से ही माना था। तभी से भारतीय पंचांग में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव संवत्सर का प्रारंभ दिवस माना जाता है।
शास्त्रों में संवत्सर आरंभ का निर्णय धर्मशास्त्रों में भी यही नियम बताया गया है। तिथि निर्णयकार में कहा गया है —
“चैत्र शुक्ल प्रतिपदि वत्सरारम्भः, तत्रौदयिकी तिथिः ग्राह्या।”
अर्थात — चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जो सूर्य उदय के समय विद्यमान हो, उसी दिन से नव संवत्सर का आरंभ माना जाता है।
वर्ष 2026 में प्रतिपदा तिथि का विशेष योग
वर्ष 2026 में विक्रमी संवत 2083 के दौरान एक विशेष स्थिति बन रही है। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का क्षय हो रहा है।
प्रतिपदा तिथि का समय इस प्रकार है —
19 मार्च 2026, गुरुवार को सूर्योदय के बाद लगभग सुबह 6:53 बजे से प्रारंभ
20 मार्च 2026 को सूर्योदय से पहले ही लगभग सुबह 5:53 बजे समाप्त
इस प्रकार प्रतिपदा तिथि 19 और 20 मार्च दोनों ही दिन सूर्य उदय के समय उपस्थित नहीं है। इसलिए यह उदय व्यापिनी तिथि नहीं बनती।
ऐसी स्थिति में शास्त्रों का निर्णय जब प्रतिपदा तिथि दोनों दिन उदय व्यापिनी नहीं होती, तब धर्मशास्त्रों के अनुसार पहले दिन ही संवत्सर का आरंभ माना जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है —
“दिनद्वये उदयव्याप्तौ अव्याप्तौ वा पूर्वा।”
अर्थात —
यदि दोनों दिनों में तिथि उदय व्यापिनी हो या दोनों दिन उदय व्यापिनी न हो, तो पहले दिन को ही ग्रहण करना चाहिए।
इसी आधार पर वर्ष 2026 में नव संवत्सर का आरंभ 19 मार्च 2026, गुरुवार को ही माना जाएगा।
वर्ष राजा (वर्षेश) का निर्णयज्योतिष शास्त्र के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जिस दिन सूर्य उदय के समय उपस्थित हो, उस दिन के वार के स्वामी ग्रह को वर्ष का राजा (वर्षेश) माना जाता है।
नियम इस प्रकार हैं —
यदि प्रतिपदा उदय व्यापिनी हो — उसी दिन का वारेश वर्ष राजा होता है।
यदि प्रतिपदा दो दिन उदय व्यापिनी हो (तिथि वृद्धि) — पहले दिन का वारेश वर्ष राजा होता है।
यदि प्रतिपदा क्षय हो जाए — तब भी पहले दिन के वारेश को ही वर्षेश माना जाता है।
अर्थात हर स्थिति में पहले दिन का वार स्वामी ही वर्ष का राजा होता है।
चैत्र नवरात्र और घटस्थापना
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही वसंत नवरात्र का आरंभ होता है। इसी दिन —
घटस्थापना
माँ दुर्गा पूजन
पंचदेव पूजन
कुलदेवता पूजन
आदि शुभ कार्य प्रारंभ किए जाते हैं।
अमावस्या युक्त प्रतिपदा का नियम देवी पुराण में लिखा है —
“अमायुक्ता न कर्तव्या प्रतिपद चण्डिकार्चने।”
अर्थात —
अमावस्या युक्त प्रतिपदा में दुर्गा पूजन नहीं करना चाहिए।
परंतु यदि प्रतिपदा का क्षय हो जाए या दूसरे दिन एक मुहूर्त से भी कम रह जाए, तब शास्त्रों ने विशेष नियम बताया है —
“मुहूर्तमात्रा कर्तव्या, द्वितीयायां गुणान्विता।”
अर्थात ऐसी स्थिति में अमावस्या युक्त प्रतिपदा में ही घटस्थापना और दुर्गा पूजन करना चाहिए।
धर्मसिंधु का मत
धर्मसिंधु के अनुसार भी यदि —
प्रतिपदा तिथि क्षय हो जाए,
या सूर्य उदय के समय एक मुहूर्त से कम रह जाए,
तो ऐसी स्थिति में अमावस्या युक्त प्रतिपदा को ही ग्रहण करना चाहिए।
निष्कर्ष
सभी धर्मशास्त्रों और ज्योतिष निर्णयों का सार यह है कि —
वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्र का आरंभ 19 मार्च 2026, गुरुवार को ही माना जाएगा।
क्योंकि प्रतिपदा तिथि 20 मार्च के सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर रही है।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त (दिल्ली NCR)
19 मार्च 2026 को अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना करना अत्यंत शुभ माना जाएगा।
समय :
दोपहर 12:05 से 12:55 तक
इस शुभ समय में आप —
संवत्सर पूजन
घटस्थापना
माँ दुर्गा पूजन
पंचदेव पूजन
कुलदेवता पूजन
आदि विधि-विधान से कर सकते हैं।

